मेहनत से कमाई गए थोड़े से पैसे भी बहुत कीमती होते हैं, सोच-समझकर करना चाहिए खर्च


44 मिनट पहले

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  • एक लड़का जरूरत से ज्यादा खर्च करता था, उसके पिता बहुत दुखी थे, एक दिन पिता ने कहा कि अब तुम रोज 10 रुपए कमाओगे, तभी तुम्हें खाना मिलेगा

जो लोग मेहनत की कीमत नहीं समझते हैं, वे ही धन का दुरुपयोग करते हैं। जो लोग मेहनत का महत्व जानते हैं, वे सिर्फ जरूरत की चीजों पर ही सोच-समझकर खर्च करते हैं। इस संबंध में लोक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार पुराने समय में एक लौहार था। उसका बेटा हमेशा व्यर्थ खर्च करते रहता था।

लौहार का कामकाज अच्छा चलता था। इसीलिए उसके पास धन की कमी नहीं थी। घर में भी कोई समस्या नहीं थी, लेकिन वह अपने बेटे की वजह से दुखी था। लड़का हमेशा जरूरत से ज्यादा खर्च करता था। एक दिन उसके पिता ने कहा कि अब से तुम्हें रोज 10 रुपए खुद की मेहनत से कमाकर लाना है। जिस दिन 10 रुपए लेकर नहीं आओगे, उस दिन तुम्हें खाना नहीं मिलेगा।

अगले दिन लड़का दिनभर फालतू घूमता रहा, लेकिन उसने कोई काम नहीं किया। शाम को जब घर पहुंचा तो उसे पिता की बात याद आई। वह तुरंत अपनी मां के पास गया। मां ने बेटे को 10 रुपए दे दिए। जब उसके पिता घर आए तो उसने 10 रुपए पिता को दे दिए। पिता ने 10 रुपए लेकर भट्टी में डाल दिए।

इसी तरह रोज चलता रहा। लड़का रोज मां से 10 रुपए लेता और पिता को दे देता। पिता वह पैसे भट्टी में डाल देते। एक दिन उसकी मां ने पैसे देने से मना कर दिया। अब लड़का को समझ नहीं आ रहा था कि पिता को 10 रुपए कैसे देगा।

वह बाजार में काम खोजने के लिए निकल गया। बाजार में उसे एक वृद्ध दिखाई दिया जो बोझ उठाकर ले जा रहा था। लड़का उस वृद्ध के पास गया और बोला कि मैं आपका सामान आपके घर पर पहुंचा देता हूं। बदले में आप मुझे 10 रुपए दे देना। वृद्ध इस बात के लिए मान गया।

लड़के ने सामान उठाया तो वह बहुत भारी था। किसी तरह उसने सारा सामान वृद्ध के घर पहुंचा दिया और 10 रुपए लेकर घर लौट आया। उसके पिता आए तो लड़के ने खुशी-खुशी वह 10 रुपए पिता के हाथ में रख दिए। रोज की तरह पिता वह पैसे भट्टी में डालने ही वाले थे, तभी लड़के ने उनका हाथ पकड़ लिया।

लड़के ने पिता से कहा कि ये पैसे मेरी कड़ी मेहनत की कमाई है। इन्हें इस तरह भट्टी में मत फेकिए। पिता ने अपने बेटे से कहा कि अब तुम्हें समझ आया कि मेहनत की कमाई की कीमत क्या होती है। तुम रोज मेरी मेहनत की कमाई ऐसे ही फिजूल खर्च करते हो, मुझे भी इसी तरह बहुत बुरा लगता है।

बेटे को पिता की बात समझ आ गई और उसने व्यर्थ खर्च न करने का संकल्प ले लिया। इसके बाद वह भी पिता के साथ काम करने लगा।

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